#जिहाद

अगर आप ग़ैर-मुस्लिमों को समझाने के लिए #जिहाद की व्याख्या करना चाहते हैं, तो इसे बिना तोड़े-मरोड़े, बिना शूगर कोटिंग किए भी आसानी से समझाया जा सकता है।

अक्सर मुसलमान जिहाद की “क़ाबिल-ए-क़ुबूल” तफ़सीर की कोशिश में लगातार तनज़्ज़ुल की राह ही चले हैं। सबसे पहले तो इसके माद्दी (जिस्मानी) मवाद को निकाल कर कहा गया, “असल जिहाद अल्लाह के लिए अपने नफ़्स के ख़िलाफ़ की गयी जद्दोजहद है”। ये फ़क़त जुज़्वी तफ़सीर है।

फिर अल्लाह को केंद्र से निकाल कर कहा गया कि “वास्तविक जिहाद, ख़ुद को बेहतर बनाने के लिए किया गया संघर्ष है”।

ज़ाहिर है , अब अधिक सोने और अधिक व्यायाम करने के लिए किया गया संघर्ष भी कुछ लोगों के अनुसार जिहाद बन गया है।

अब चूंके जिहाद का मतलब सिर्फ़ “संघर्ष करना” रह गया, तो हराम कामों जैसे डेट पर जाने, अधिक से अधिक अवैध संबंध बनाने, व्यभिचार इत्यादि के लिए कोशिश करना भी जिहाद बन गया।

इस तरह , जिहाद को पश्चिमी बुर्जुआ गोरों में प्रचलित सेल्फ़-हेल्प (स्वावलंबन) की पूर्णतः सेक्युलर धारणा बना दिया गया. कई बार पस्ती का ये आलम मुझे ये दुआ करने पर मजबूर कर देता है कि काश अपने दीन के साथ ख़ुद ही इतना ख़राब सुलूक करने के जुर्म में, इस्लाम के दुश्मन हमें दुनिया के नक़्शे से ही मिटा दें। क्या ये हद नहीं है ?

वही घिसे-पिटे “आंतरिक संघर्ष” को दुहराने, जिहाद के अर्थ को तोड़ मरोड़ कर पेश कर, उसकी शक्ल बिगाड़ कर टोनी रॉबिन्स की पॉज़िटिव साइकोलॉजी बनाने के बजाय, हर संस्कृति और नैतिक प्रणाली में आम, आत्म-बलिदान के भाव की ओर तवज्जुह दिलायें।

क्या हम राष्ट्रवादियों को “देश के लिए जान देने” की महानता का व्याख्यान करते नहीं सुनते? #अगर_वो_यह_समझ_सकते_हैं_तो_जिहाद_को_भी_समझ_सकते_हैं

क्या हमने ईसाईयों को नहीं देखा जो अपने धर्म का आधार ही यीशु(अ०) की क़ुरबानी पर रखते हैं?
#अगर_वो_उसे_समझ_सकते_हैं_तो_जिहाद_को_भी_समझ_सकते_हैं

क्या हमने लिबरल-सेक्युलरवादियों को फ्रांस वग़ैरह के उन पहले क्रांतिकारियों का गुणगान करते नहीं देखा जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी ख़तरे में डाल कर, अपने स्वतंत्रता के सिद्धान्त के लिए लड़ा?
#अगर_वो_उन्हें_समझ_सकते_हैं_तो_जिहाद_को_भी_समझ_सकते_हैं

आत्मबलिदान और ईश्वर एंव हक़ (परम सत्य) के लिए अपनी जान दांव पे लगा कर लड़ना यूनिवर्सल (सार्वभौमिक) मूल्य है।

दुर्भाग्यवश, मुसलमानों को लगता है कि इस्लाम के इस महत्वपूर्ण हिस्से को छुपाकर या नकार कर वो ख़ुद को और सम्बद्ध बना रहे हैं। असल में वो इसके बिलकुल उलट कर रहे हैं।

हाँ ऐसे मुसलमान भी हैं जो जिहाद का दुरूपयोग उन आपराधिक कृत्यों के लिए कर रहे हैं जिनका इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं। लेकिन हमें कुछ अपराधियों के कारण दीन के एक महत्वपूर्ण हिस्से को छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।

अमेरिकी [या अन्य] सेना लगातार अत्याचार कर रही है, लेकिन कोई भी (यहाँ तक के अमेरिकी [या अन्य] मुसलमान भी) इस विचार को नहीं त्याग रहा के ” अपने देश के लिए जान देना महान कार्य है “। कुछ ईसाई गिरोहों ने भी अत्याचार किया है, फिर भी आत्मबलिदान की धारणा उनकी शिक्षा और धर्मशास्त्र में कम नहीं हुई है। और लिबरल-सेक्युलरवादियों का इतिहास तो सबसे अधिक ख़ूनी रहा है, और उनमें सबसे निरंकुश और क्रूर शासक हुए हैं, फिर भी वो “मुझे आज़ादी दो या मुझे मौत दो” के मन्त्र का गुणगान करते हैं।

ये सिर्फ़ मुसलमान ही हैं जिन्हें अपने मूल्यों को बिना अर्थ और महत्त्व के , ‘नर्म’ हास्यास्पद और नक़ली बनाना पड़ा।

अगर आप जिहाद का अर्थ जानना चाहते हैं तो जंग-ए-बद्र के बारे में पढ़िए, कैसे इस्लाम के दुश्मन अल्लाह के नूर को बुझा देना चाहते थे, और ईमान वालों (सहाबा) का उस बारे में क्या विचार था। मैं चुनौती देता हूँ हर किसी को कि इस निर्णायक घटना के बारे में सुने (जाने), और फिर भी जिहाद को नेकी और दुनिया की तमाम भलाइयों का शिखर ना माने।

यहाँ तक के वो भी जो इसलाम को नहीं मानते या इस्लाम से नफ़रत करते हैं, शारीरिक लड़ाई और भौतिक संघर्ष को नैतिकता के मूल तत्व के रूप में मानते हैं। सुपरहीरो कॉमिक या फिल्म जो हम अपने बच्चों और परिवार को दिखाते हैं, क्या उनका संदेश यही नहीं होता?
क्या हर बड़ी ब्लॉकबस्टर फ़िल्म का थीम यही नहीं होता?
ये सेक्युलर दुनिया रस्म और ख़ोल तो चाहती है, लेकिन मग्ज़ (core) और सार को छोड़ देती है।
यही है हमारी खोखली आधुनिकता, बिना आध्यात्मिक मर्म (core) के.
मुसलमान तो अपना स्तर इससे भी नीचे गिरा रहे हैं।

 

 

#जिहादअगर आप ग़ैर-मुस्लिमों को समझाने के लिए #जिहाद की व्याख्या करना चाहते हैं, तो इसे बिना तोड़े-मरोड़े, बिना शूगर कोटिं…

Posted by Daniel Haqiqatjou – Hindi on Tuesday, October 11, 2016

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My recent post on jihad has been translated to Hindi and German. Check them out…

Posted by Daniel Haqiqatjou on Wednesday, October 12, 2016

Daniel Haqiqatjou

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