नास्तिक दुख, दर्द और त्रासदी के अस्तित्व का तर्क देके कहते हैं की कोई खुदा नहीं है।

लेकिन इस भावनात्मक रणनीति का उनपे कोई असर नहीं होता जो ‘आख़री दिन’ पर ईमान रखते हैं।

‘आख़री दिन’ का मतलब है पूरी तरह से बर्बादी और विनाश। सारी सभ्यताएं, सारी “इंसानी उपलब्धियां”, और इंसानियत के सारे अवशेष अपने वजूद से मिटा दिए जाएंगे। बल्कि इंसानियत से बढ़कर, पूरा ब्रह्माण्ड ख़ुद में ही सिंकुड़ जाएगा। हमारे गिर्द की सारी ख़ूबसूरती और खुशियाँ गुमनामी की दुनियाँ में झोंक दी जाएंगी, पहाड़ों और समंदरों से ले के सितारों और आसमानों तक। यहाँ तक की फ़रिश्ते भी ख़त्म हो जाएंगे।

‘आख़री दिन’ शिखर है विनाश का और किसी भी मौत या बर्बादी का जो हम अपने आस पास देखते हैं, चाहे वो कितनी भी दर्दनाक, भयानक या क्रूर हो – सिर्फ झलकियाँ हैं उसकी जो आने वाली है। ख़ुदा हर चीज़ को ख़त्म कर देगा जो उसने बनायीं। और फिर वो उसको सिरे से दुबारा ज़िंदा करेगा।

‘आख़री दिन’ पे सोंच विचार करना बढ़ाता है हमारे ख़ुदा पर ईमान को। खुदा- जो अपनी बेपनाह ताक़त से हर चीज़ को बनाता है, बिगाड़ता है, जिलाता है, और मारता है।

अगर इतनी बड़ी त्रासदी और सब कुछ ख़त्म कर देने वाली आपदा का इल्म (ज्ञान) किसी के ईमान को बढ़ा देता है, तो भला कैसे इसकी तुलना में लाख गुना छोटी चीज़ें – वो जो हम अपनी ज़िन्दगी के सफ़र में अनुभव करते हैं – किसी को (ख़ुदा के बारे में) शक में डाल सकती हैं?

Translated by: Md Adil Hussain

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Posted by Daniel Haqiqatjou on Monday, August 15, 2016

 

Daniel Haqiqatjou

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