असल में “आज़ाद ख़याल” कौन है?

एक नास्तिक (बेदीन मुल्हिद), जो:

1) सेक्युलर निज़ाम में रहता है,

2) ऐसे स्कूल में जाता है जिसमे पाठ्यक्रम का आधार वो सेक्युलर फ़लसफ़े हैं जो “सोच-ओ-फ़िक्र” की आड़ में दीन/धर्म को सवालों से घेरें रहते हैं और लगातार उसकी आलोचना करते हैं,

3) एक ऐसे संभ्रांतवादी सेक्युलर तहज़ीब में रचा-बसा है जो न तो ख़ुदा को और ना ही धर्म को पहचानती है,

4) हर दिन और हर वक़्त ऐसे मीडिया, फिल्मों और गानों से घिरा रहता है जो या तो ख़ुदा के वजूद पर ध्यान ही नहीं देते या ख़ुदा के होने पर ही सवाल खड़े करते हैं ,

5) रहता तो एक ऐसे परिवेश में है जो पूरे तौर पर सेक्युलर है, जहां “धार्मिक” होना भोलापन/मूर्खता के समान और धर्म को हमेशा शक की निगाह से देखना रौशन खयाली के समान है,

और फिर, इन तमाम सहूलियतों के बावुजूद, अहंकार (तकब्बुर) के साथ यह ढिंढोरा पीटता है कि उसने, सभी बाधाओं के खिलाफ, सदी की सबसे महान खोज की है – “यूरेका! कोई ख़ुदा नहीं है!”?

…………… या एक मुसलमान, जो:

1) सेक्युलर निज़ाम में रहता है,

2) ऐसे स्कूल में जाता है जिसमे पाठ्यक्रम का आधार वो सेक्युलर फ़लसफ़े हैं जो “गहन सोच” की आड़ में दीन/धर्म को सवालों से घेरें रहते हैं और लगातार उसकी आलोचना करते हैं,

3) एक ऐसे संभ्रांतवादी सेक्युलर तहज़ीब में फसा है जो तहज़ीब इस्लाम को पिछड़ा और आतंकवादी समझती है,

4) हर दिन और हर वक़्त ऐसे मीडिया, फिल्मों और गानों से घिरा रहता है जो या तो ख़ुदा के वजूद पर ध्यान ही नहीं देते या ख़ुदा के होने पर ही सवाल खड़े करते हैं और ख़ास तौर पर इस्लाम पर हमला बोलते हैं,

5) रहता तो एक ऐसे परिवेश में है जो पूरे तौर पर सेक्युलर है , जहां “धार्मिक” होना मूर्खता के समान और धर्म को हमेशा शक की निगाह से देखना रौशन खयाली, और मुस्लिम होने का मतलब या तो (सबसे नरम लव्ज़ो में) सीधापन है या (सबसे बुरे लव्ज़ो में)- मध्ययुगीन बर्बरता,

और फिर, इन सब मुश्किलो के बावुजूद, अपने इस्लामी अक़ीदे में यकीन और आत्मविश्वास बनाए रखता है, जैसा की जलते हुए कोयले को हाथ में ले लिया हो। और लगातार दबाव में भी मज़बूती से अपने ईमान पर कायम रहता है?

दोनों में किसने वाक़ई में धार के खिलाफ चल कर ज़बरदस्त मुश्किलात में भी सच्चाई की तलाश की है?

Translated by: Mohammad Younus

Daniel Haqiqatjou

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