मुल्हिद (नास्तिक) अक्सर ये दावा करते हैं कि लोग बुनियादी तौर पे ख़ुदा को जज़्बाती वजहों से मानते हैं, सोच समझ कर नहीं। मुल्हिद, इसके बरअक्स, ज़्यादा सोचने समझने वाले और तहक़ीक़ करने वाले होते हैं – और इनके इल्हाद (नास्तिकता) की बुनियाद ठोस हक़ीक़तों पे होती है, बजाए जज़्बात के।

लेकिन महसूस होता है कि मामला ऐसा है नही! जैसा कि नीचे दी गई नफ़्सयाती तहक़ीक़ बताती है : मुल्हिदों की अच्छी ख़ासी तादाद ऐसी है जिनके ख़ुदा के इनकार की बुनियाद ख़ुदा से नाराज़गी है; या तो कोई हादसा जिसकी वजह से वो ख़ुदा के वजूद पे शक करने लगे। ज़ाहिर है, एक ख़ालिक़ के वजूद के होने या ना होने का इससे कोई वास्ता नही है कि वो ख़ालिक़ आपके साथ अच्छा सलूक करता है या बुरा। एक ख़ालिक़ के होने का इनकार इस बिनाह पे के वो एक शख्स को कैसा लगता है या उस शख्स को अपनी ज़िंदगी कैसी लगती है – सरासर जज़्बाती ख़याल है जिसका अक़्ल से कोई लेना देना नही।

इसमें मेरे लिए मज़ेदार बात ये है कि होशियारी के साथ एक शख़्स बड़ी आसानी से आवाम में बड़े पैमाने पर इल्हाद फैला सकता है। बस लोगों के जज़्बात के साथ ज़रा सा खेलना है। उन्हें ऐसा महसूस कराना है कि ज़िन्दगी बड़ी बेइन्साफ़ है – दर्द, मुश्किलात और मुसीबतों से भरी। टी.वी, सोशल मीडिया, और एक 24 घंटे का ख़बरनामा – ऐसा जो तशद्दुद की मौत और तबाही पर ग़ैर-मामुली तवज्जो दे – इस काम को अंजाम देने के लिए बेहतरीन औज़ार हैं। और इसके साथ ये शोशा जोड़ लीजिये की मुनज़्ज़म दीन एक दम घोटने जैसा बोझ है, और दीन का उल्टा यानी लिबरल-हियुमनिज़्म पुर-सोज़ है, खुशहाल ज़िन्दगी का वाहिद रास्ता है। इससे पहले की आपको कुछ पता चले, इल्हाद दुनिया का सबसे तेज़ फैलता दीन बन कर सामने आ जायेगा। लेकिन “साइंस और अक़्ल की जीत” की वजह से नही – दरअसल इसके बिल्कुल उलट।
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“जर्नल ऑफ पर्सनालिटी एंड सोशल साइकोलॉजी की एक नई तहक़ीक़ से पता चला है कि मुल्हिद और संशयवादी (ख़ुदा के वजूद पे शक करने वाले) अतीत में ख़ुदा से नाराज़गी का इज़हार करते हैं या एक खास तसव्वुराती नक्शे से नफरत का जो उनके मुताबिक ख़ुदा होना चाहिए… एक्सलिन बताती हैं कि इस तहक़ीक़ की तरफ उनका रुझान तब बढ़ा जब इससेे पहले एक तहक़ीक़ का अजीब नतीजा निकला : जिन्होंने ख़ुदा पे ना ईमान रखने का दावा किया, उन्होंने ख़ुदा से कहीं ज़्यादा नाराज़गी का इज़हार किया बनिस्बत उनके जो ईमान रखते हैं।

“शुरुआत में इस तहक़ीक़ में कुछ ग़लती महसूस हो रही थी: भला लोग ख़ुदा से ख़फ़ा कैसे हो सकते हैं अगर वो ख़ुदा पे ईमान ही नही रखते? लेकिन कुछ दूसरे डेटा की तहक़ीक़ का भी ऐसा ही नतीजा निकला: “इल्हादी/संशयवादी” या “कुछ नही/ पता नही” अक़ीदा रखने वालों ने ख़ुदा से ज़्यादा नाराज़गी का इज़हार किया बनिस्बत उनके जो किसी ख़ास दीन से अपना रिश्ता जोड़ते हैं।”

Translation of This post
Traslated by: Md Adil Hussain

#इल्हाद : #_अक़्ल_पे_मबनी_या_जज़्बात_पे ? मुल्हिद (नास्तिक) अक्सर ये दावा करते हैं कि लोग बुनियादी तौर पे ख़ुदा को…

Posted by Daniel Haqiqatjou – Hindi on Friday, February 9, 2018

Md Adil Hussain

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