यूनिवर्सिटियों के इस्लामी शोबों/डिपार्टमेंट से निकलने वाले मुस्लिम मुस्लिहीन/सुधारकों से सावधान रहें।

ये ज़ेहनी तौर पे अक्सर बहुत उलझे लोग होते हैं। लेकिन ये बड़े एतमाद से “इस्लाम में इस्लाह/सुधार” की अख़लाक़ी ज़िम्मेदारी पे बात करते हैं।

इनको जो चीज़ ख़तरनाक बना देती है वो ये है कि ये क्लासिकी किताबों से हवाला देते हैं ताकि आम मुसलमान को लगे कि इनकी ‘दीन में इस्लाह’ इस्लामी रवायत की तरफ से है या रवायत में मौजूद “गंदगी” की वजह से बहुत ज़रूरी है। लेकिन इनके हवाले हमेशा इधर उधर से आधी अधूरी उठाए, और तोडे मरोडे होते हैं। कभी कभी उनको ख़ुद पता नहीं होता। और कभी कभी ये जान बूझ कर ऐसा करते हैं।

एक चीज़ जो मग़रिबी इल्मी रवायत आपको सिखाती है वो ये है की आप अपने मवाद के साथ कैसे ‘तख़लीकी’ कारनामे दिखा सकते हैं और अपने मन के मतलब ठूस सकते हैं। और “इल्म” का ये अंदाज निकला है पोस्टमॉडर्निज़्म के एक चोंचले से – ऐसा चोंचला जो लिबरल आर्ट्स में भरा पड़ा है – वो ये की किसी भी लिखी चीज़ का खुद में कोई मतलब नही होता, वो महज़ अलग अलग पढ़ने वाले होते हैं जो अपने मतलब उसपे चस्पा कर देते हैं। यानी उनके मुताबिक, कसी का मतलब किसी से बेहतर नही होता। यानी हर मतलब क़ाबिल-ए-तवज्जुह-ओ-तहक़ीक़ होता है, और यूनिवर्सिटी इसी का मौक़ा फ़राहम करती है।

जैसा कि आप अब तसव्वुर कर सकते हैं, ये इन मुसलमानों के लिए बहुत आसान कर देता है एक इधर उधर की घिसी-पिटी तशरीह को इल्मी और क़ाबिले-क़ुबूल कहना क्योंकि “बहरहाल, हर किसी की समझ किसी न किसी तरह आधी अधूरी, इधर उधर की उठाई ही होती है, तो भला मेरी समझ को किसी भी तौर पर कम मुनासिब क्यों समझा जाए?” वगैरा, वगैरा। इसके कहने के बाद क्या ही कहना बाकी रह जाता है कि ये सारी चीज़े तूल देती हैं नाक़ाबिल-ए-ऐतबार तशरीहों को जो आम मुसलमानों को पेश किए जाते हैं बिल्कुल उतना ही दुरुस्त कह के जितनी ज़िम्मेदारी के साथ हम तक पहुंची इस्लामी-इल्मी-रवायत है।

वज़ाहत के लिए: यहां मैं सिर्फ “दीन में इस्लाह” करने वालों की बात कर रहा हूँ।

Translation of This post.
Translated by: Md Adil Hussain

यूनिवर्सिटियों के इस्लामी शोबों/डिपार्टमेंट से निकलने वाले मुस्लिम मुस्लिहीन/सुधारकों से सावधान रहें।ये ज़ेहनी तौर पे…

Posted by Daniel Haqiqatjou – Hindi on Sunday, July 1, 2018

Md Adil Hussain

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