झंडा जलाना और मज़ीद तज़ाद

अगर आप हिंदुस्तानी रूढ़िवादियों की बातों पर ग़ौर करें – के जिस तरह वो “झंडे” और “संविधान” की बात करते हैं – तो आपको मालूम होगा की वो बहुत छोटा हिस्सा है उसका के जिस तरह मुसलमान इस्लाम के शआर (पाक निशानियों) को देखते हैं। और ये बात बिलकुल सही है क्योंकि हिंदुस्तानियों के लिए हिंदुस्तान खुद एक दीन है। और हर मज़हब की तरह इसकी भी पाक निशानियाँ और रस्मों-रिवाज हैं।

अगर आप ये तुलना कर पा रहे हैं तो बताइए, झंडा जलाना मुसलमानों के लिए किस की मिस्ल है? क़ुरान को जलाने या उसकी तौहीन करने के, है न? और ऐसे में हमारे अहसास ओ जज़्बात बिलकुल उसी तरह होंगे जैसा के रूढ़िवादी हिंदुस्तानियों के झंडा जलाने पर होते हैं। तो, मेरी नज़र में – एक अंदाज़ से – हम उनका दर्द महसूस कर सकते हैं। वो झंडा जलते देखने (या ऐसी कल्पना तक) का दर्द हमारे लिए कोई बहुत नई या न समझ में आने वाली चीज़ नही है।

ये बात, दूसरे धर्मों को मिला कर चलने करने की धारणा को, मज़ेदार मायने फ़राहम करती है। अल्लाह कहता है: “और ये (मुशरेकीन) जिन की अल्लाह के सिवा (ख़ुदा समझ कर) इबादत करते हैं उन्हें तुम बुरा न कहा करो वरना ये लोग भी ख़ुदा को बिना समझें अदावत से बुरा (भला) कह बैठें। (और लोग उनकी ख्वाहिश नफसानी के) इस तरह पाबन्द हुए कि गोया हमने ख़ुद हर गिरोह के आमाल उनको सॅवाकर अच्छे कर दिखाए। फिर उन्हें तो (आख़िरकार) अपने परवरदिगार की तरफ लौट कर जाना है तब जो कुछ दुनिया में कर रहे थे ख़ुदा उन्हें बता देगा।” (6:108)

जब “देशभक्ति” एक दीन है, तो क्या इस आयत का मतलब ये नहीं की मुसलमान झंडा जलाने के खिलाफ़ हैं, क्योंकि ये हिंदुस्तान के एक बड़े तबके को ठेस पहुंचाता है?

लेकिन क्या हो अगर ये झंडा – जो की किसी एक तबके के लिए पाक निशानी हो – किसी दूसरे तबके के लिए शैतानी मायने रखता हो? क्या हो अगर ये सच में कई घिनौनी चीज़ों का प्रतीक हो – जैसा की सालों-साल के ज़ुल्मों-जब्र और क़त्लेआम का? क्या हो अगर कुछ लोगों के लिए हिंदुस्तानी झंडा ‘स्वास्तिका’ जैसे मायने रखता हो? ऐसे में, क्या उनके लिए मज़हबी निशानियों को जलाना जायज़ होगा?

और अगर पोशीदा शैतानियत की बुनियाद पे मज़हबी निशानियों को जलाना या पामाल करना ठीक है, तो क्या हो अगर सवाल “हिंदुस्तानियत” मज़हब पे नहीं बल्कि आम मज़ाहिब – जैसे हिन्दू, बौद्ध, यहूदियत, ईसाइयत, या खुद इस्लाम पर हो?

और अगर आप अब भी ये नहीं समझ पाए हैं कि मैं बात कहाँ लाना चाह रहा हुँ : अगर इब्राहिम (अलैहिस सलाम) आज यहाँ होते, तो क्या वो झंडा जलाने वालों में (न) होते?

Translation of This post
Translated by: Md Adil Hussain

#_झंडा_जलाना_और_मज़ीद_तज़ाद।अगर आप हिंदुस्तानी रूढ़िवादियों की बातों पर ग़ौर करें – के जिस तरह वो "झंडे" और "संविधान" की…

Posted by Daniel Haqiqatjou – Hindi on Friday, December 23, 2016