कोई देवबंदी है, या सलफ़ी है, या सूफी, या बरेलवी, इन जैसे मामूली मसलों पर,आपके यहाँ जो चीख़-पुकार और लड़ाइयां मची हैं, वह अपने असरात पांच-दस या पंद्रह साल में ज़ाहिर करेंगी || तब आप देखेंगे कि इन तल्ख़ बहसों ने आपके ख़ुद के बच्चों को किन-किन शक-ओ-शुबहात में मुब्तिला कर दिया है !!

अभी तक तो मेरी नज़र में कोई भी ऐसा नौ-जवान मुस्लिम आना बाक़ी है कि जिसने सिर्फ इस तरह के किसी मामूली मसले, जैसे कि “फ़क़त एक मज़हब को मानना बिद्दत है या नहीं ?” पर इस्लाम ही पर सवाल खड़े किये हों, या इस्लाम को छोड़ने की बात की हो || लेकिन आगे ऐसा हो सकता है ||

मैं ये नहीं कह रहा कि मामूली मसलों पर बिद्दत वग़ैरह के सवालों पर चर्चा नहीं होनी चाहिए, लेकिन मैं ये कह रहा हूँ की उम्मत के पास बहुत महदूद वसाइल हैं, बहुत ही महदूद अक़्ली और ज़हनी सरमाया है, नज़र और याददाश्त भी तंग है || लेकिन फिर भी इस तरह के तल्ख़-इख़्तेलाफ़ात बुनियादी-मज़हबी-इख़्तेलाफ़ात के ज़ुमरे में ही क़ुबूल कर लिए गए हैं ||

अब सवाल ये है कि क्या हम अपने महदूद वसाइल (लिमिटेड रिसोर्सेज) का जायज़ इस्तेमाल कर रहे हैं ?

Translation of This post
Translated by: Faraz Bukhari

#प्राथमिकताएँ #तर्जीहातकोई देवबंदी है, या सलफ़ी है, या सूफी, या बरेलवी, इन जैसे मामूली मसलों पर,आपके यहाँ जो चीख़-पुकार…

Posted by Daniel Haqiqatjou – Hindi on Tuesday, September 13, 2016

Md Adil Hussain

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