कैसा होता गर अल्लाह क़ुरान में सिर्फ जन्नत का ज़िक्र करता और जहन्नुम की हक़ीक़त बयान न करता?

कैसा होता गर नबी (स०) सिर्फ एक मुबश्शिर (खुशखबरी देने वाले) होते और मुंज़िर (डराने वाले) न होते?

ऐसे में क्या ज़्यादा लोग इस्लाम की तरफ़ राग़िब होते? क्या ये दीन फिर लोगों को ज़्यादा पसंद आता? क्या फिर थोड़े कम मुसलमानों का ईमान ख़तरे में पड़ता? क्या थोड़े कम लोग इस्लाम तर्क करते?

जब हम (दावत के मैदान में) संतुलन / तवाज़ुन खो देते हैं तो इस्लाम एक “motivational seminar इस्लाम” बन कर रह जाता है – जिसका मक़सद सिर्फ लोगों को अपनी दशा के बारे अच्छा महसूस करवाना होता है, ताकि लोग बार बार लौट कर वही चीज़ सुनने आते रहें।

Televangelist ईसाईयों ने इस आसान तरीके को इख्तियार कर अपनी किस्मत चमका ली। सेक्युलर “positive psychologists” aur “self help” गुरुओं ने भी ऐसा किया और एक multi billion industry बना ली। ये सब सिर्फ लोगों को ये कहने के लिए की वो ‘लाजवाब’ हैं, और सब ठीक हो जाये अगर वो ‘ख़ुद के लिए सच्चे हो जाएं’ और हमेशा ‘अच्छा सोंचे’ वगैरा वगैरा। मुसलमानों ने भी धीरे धीरे उसी रास्ते पे चलना शुरू कर दिया है।#गिरगिट_का_बिल

Translation of This post
Translated by: Md Adil Hussain

#_दावत_में_तवाज़ुनकैसा होता गर अल्लाह क़ुरान में सिर्फ जन्नत का ज़िक्र करता और जहन्नुम की हक़ीक़त बयान न करता?कैसा होता…

Posted by Daniel Haqiqatjou – Hindi on Saturday, December 31, 2016

Md Adil Hussain

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