“कितना मुश्किल है एक औरत को साथ सोने के लिए राज़ी करना।”

“हाँ, बताओ ज़रा मुझे। पहले तुम्हे उससे शादी करनी पड़ेगी। जिसका मतलब है उसके घर वालों को, माँ को, शक्की बाप को, सबको मनाना। फिर शादी में खर्च करना, मेहर देना वगैरा वगैरा। और ये तो बस शुरुआत है। कौन चाहता है जिंदगी भर एक औरत से बंधे रहना, उसकी जिम्मेदारी उठाना, और ग़ालिबन कुछ बच्चों की भी? मैं सिर्फ बिना किसी चोंचलेबाजी के एक रात मज़े करना चाहता हुँ, या जब तक मेरा जी चाहे। क्या भसड़ है!”

“सही में यार, बहुत भसड़ है!”

“काश के कोई आसान रास्ता होता कुछ काम निकलने का।”

“वैसे, शायद एक तरीका है…”

“क्या बे? बता ज़रा हमें भी।”

“कैसा रहेगा अगर हम लोगों को ये कहना शुरू कर दें कि शादी असल में औरतों पे ज़ुल्म करने का एक तरीका है?”

“हह, कौन यकीन करेगा इसपे?”

“यही तो खेल का मज़ेदार हिस्सा है! हर वो चीज़ जो हम जैसे लड़कों को लड़कियों का फायदा उठाने से रोकती है, उसे हम ऐसा दिखाएंगे की उसी ने औरतों को पीछे कर रखा है, वही उनपे ज़ुल्म है और वही उनकी आज़ादी छीन रहा है।”

“सुनने में तो मज़ेदार लग रहा है, पर पता नहीं, मार्किट में चलना मुश्किल है।”

“अबे यार! ज़रा सोंचो तो सही।”

“अच्छा, ठीक है। एक सबसे बड़ा रोड़ा बाप होता है। अगर हम लड़कियों के दिमाग मे किसी तरह ये डाल दें कि उनके अब्बा कुछ ज़्यादा ही ख़याल रखते हैं और ज़्यादा ही टांग अड़ाते हैं।”

“जे बात! बल्कि आगे बढ़ के, उनके दिमाग़ में ये डाल दें कि उनके अब्बा उन्हें अपना ग़ुलाम समझते हैं! और वो खड़ूस डरपोक हैं जो अपनी बेटियों को कंट्रोल और परेशान करने में आनंद लेते हैं।”

“पर बेटियां भला अपने ही अब्बाओं के बारे में ऐसा क्यों सोंचेंगी?

“हम बस उन्हें ये बावर करा देंगे कि उनके अब्बा इस इन्तेहाई ज़ालिम समाज का हिस्सा हैं, जो कि सिर्फ और सिर्फ औरतों पे ज़ुल्म करने के लिए बनाया गया है। हम इस सामाजिक निज़ाम का नाम भी अब्बाओं पर रख सकते हैं।”

“अब्बा-हुकूमत?”

“में सोच रहा था: ‘पेट्रीआर्की’ (पितृतंत्र)”

“ये भी अच्छा है!'”

“हम इन अब्बाओं को ऐसे दिख सकते हैं की ये इस ज़ालिमाना पेट्रीआर्की का एक हिस्सा हैं, और हम सफेद शहसवार हैं जो इन मासूम-मज़लूम लड़कियों को इस घिनौने जाल से निकलने आये हैं।”

“भाई मज़ा आ जायेगा! पर अगर इनके अब्बा ही इनकार कर दें कि ये अपने ही बीवी और बच्चियों के ख़िलाफ़ किसी ऐसी साज़िश का हिस्सा हैं तो?”

“ह्म्म्म, अच्छा सवाल है… हम उन्हें ये कह देंगे कि ये ‘इंटर्नलिसज़्ड पेट्रीआर्की’ है मतलब ये चाचे अनचाहे लोगों के अंदर समा गई है और लोगों को इसका अंदाज़ भी नहीं!”

“ज़बरदस्त, ये काम कर जाएगा!'”

“और जब हम ये सब मानव लें, तो लड़कियों से बोलेंगे कि इस घटिया पेट्रीआर्की से लड़ने का सबसे बेहतर तरीका है कि वो अपने अब्बाओं का घर छोड़ें और और हम जैसे लड़कों के साथ अपनी ‘जिंसी आज़ादी’ का लुत्फ उठाएं।”

“प्लान तो बहुत अच्छा है! पर उनके मज़हबी ज़िम्मेदारियों का क्या? क्या वो इस तरह अपने अक़दार और अख़लाक़ियात की धज्जियां उड़ाने में बुरा महसूस नही करेंगी?”

“बहुत आसान है। हम कह देंगे कि मज़हब भी इसी घिनौने पेट्रीआर्की का हिस्सा है। या अगर ये ज़्यादा लगे तो, ये कहेंगे कि जब भी मज़हब औरत की बात करता है तो इसी पेट्रीआर्की की बुनियाद पर करता है। इसलिए हमें मज़हब की एक नई तशरीह करनी होगी इसे इंसाफ-पसंद बनाने के लिए। ज़ाहिर सी बात है, हम सारे मर्द मज़हबी आलिमों को भी औरतों को कंट्रोल करने वाला घिनौना हवसी क़रार दे सकते हैं।”

“लाजवाब!”

“अब चलो इस पैग़ाम को फैला कर आराम से बैठते हैं। देखना लड़कियां कैसे अपनी इस नई आज़ादी को इस्तेमाल करने के लिए हमारे पास आती हैं!”

“हाँ! पर हम इस नए ‘पुरउम्मीद’ पैग़ाम को क्या नाम दें?”

“‘वुमनिज़्म’ कैसा रहेगा? बल्कि उससे भी बेहतर: ‘फेमिनिज़्म’? इस तरह उन्हें ये भी लगेगा कि हम औरतों ही के हक़ में काम कर रहे हैं।”

Translation of This post
Translated by: Md Adil Hussain