मैं कोशिश करता हुँ की इस पेज पे कोई भी ज़ाती (निजी) बात ना डालूँ, लेकिन मुझे लगता है कि अपने ख़यालात और जो मैं यहाँ लिखता हुँ इसका कुछ पसे-मंज़र सामने रखना फायदेमंद होगा।

मैं एक ग़ैर-सुन्नी, सेक्युलर मुसलमान घराने से आया हूँ। मैंने हमेशा अपने आपको एक मुसलमान समझा अल्हम्दुलिल्लाह, लेकिन बड़े होने की उम्र में मैं बुनियादी इस्लामी अक़ीदे और अरकान से अनजान रहा। मैंने हाई-स्कूल और कॉलेज में थोड़ा पढ़ना शुरू किया।

इस इल्म के पूरे सफर में कई बार ऐसा हुआ कि जो मैं ख़ुदा, दुनिया और इस्लामी तारीख़ के बारे सच समझता था टकराता था उससे जो में दीन के बारे में पढ़ता था। ये तकरार हमेशा बहुत मुश्किल होती थी। इस बात का एहसास आसान नहीं है कि जिसको आप सच समझते हैं वो झूठ हो सकता है। लेकिन मैंने ठान ली कि हर चीज़ की आख़री दर्जे में तहक़ीक़ करूँगा – और हर मसले को अक़्ल और मंतक के सबसे आला मयार पे परखूँगा।

इसी तहक़ीक़ के ज़रिए से कई सालों में एक एक कर के मेरा पूरा नज़रिया बदल गया। मैं एक ग़ैर-सुन्नी था और सुन्नी हो गया क्योंकि मेरी तहक़ीक़ ने मुझे यहां ला छोड़ा, अगरचे मेरे घर और आस पास वाले इससे -अगर कम से कम कहा जाए तो – बहुत खुश नही थे।

एक वक्त था जब सेक्युलरिज़्म, दीन और रियासत अलग होना, वगैरा, मुझे मुकम्मल तौर पे सही लगते थे। लेकिन दूसरों से कई चीज़ें सीखने और खुद मज़ीद ग़ौर-ओ-फिक्र के बाद, मैंने पाया कि ये नज़रिये कई पहलुओं से खोखले और ग़ैर-अक़्ली हैं। और एक बार फिर, इस बदलाव को मेरी ज़िंदगी से जुड़ा हर शख़्स अच्छा नहीं समझ रहा था।

आप मानें या ना मानें, एक ज़माने में मेरे ख़यालात बिल्कुल लिबरल थे। मैं समझता था की आज़ादी, बराबरी, रवादारी जैसे तसव्वुरात से ज़्यादा कोई चीज़ इतनी मुतास्सिरकुन और अनमोल नहीं हो सकती। इन तसव्वुरात के साथ, मुझे लगता था कि यही बेहतरी और इंसाफ के सबसे ज़्यादा नज़दीक है। फिर मैंने और पढ़ा/सीखा। और ये आसान काम नही था। लेकिन जैसे जैसे आप सीखते जाते हैं, ऐसे तसव्वुरात पे जमे रहना उतना ही मुश्किल होता जाता है जिसे आप जान लेते हैं कि ये ग़लत और मंतिक के पैमाने पे हल्के हैं।

यही मामला साइंटिज़्म और मटेरिअलिज़्म (माद्दियत) के साथ रहा। मैं कई मसलों में कंफ्यूज़ रहता था और “हम कभी यक़ीन के साथ नहीं जान सकते कि ख़ुदा है” जैसी बेतुकी बातें कहता था। इरतक़ा (evolution) एक और वो मसला था जिसे मैं तवव्वुर नहीं नही कर पाता था कि मौजूदा समझ ग़लत कैसे हो सकती है। तो मैंने एक डिग्री फिजिक्स में हासिल की, माद्दी दुनिया को बेहतर तरीके से समझने के लिए – ये सोच के की ये मुझे ख़ुदा और इंसानी वजूद को समझने में मदद करेगा। पर ये सब महज़ खोखले दावे थे। फिर मैंने ये समझना चाहा कि ये खोखले दावे क्यों थे। ये समझने के लिए मैंने फ़लसफ़े की बाक़ायदा पढ़ाई की – साइंस का फलसफा, इरताक़ई हयातीयात (evolutionary biology) का फलसफा, वगैरा। और इसके नतीजे में मेरे ख़यालात सिरे से बदल गए।

और सबसे मज़ेदार बात : मैं खुद एक ज़माने में खुद को बड़े फ़ख्र से मुस्लिम फेमिनिस्ट कहता था! लेकिन फिर, मज़ीद तहक़ीक़ और अपने मुअक़्क़फ़ को असातज़ा, अहबाब, और जो मैं पड़ता था उससे चैलेंज होने ने मेरा जाविया-ए-नज़र बदल दिया।

इस पूरी कहानी सुनाने में मंशा ये वाज़े करना है कि ये एहसास बहुत दर्दनाक होता है की आप उस मामले में ग़लत हैं जिसे आप दिल की गहराइयों से यक़ीन करते आएं हैं। लेकिन अगर एक चीज़ है जिसे आप सच जानते हैं या उसके सच होने का अंदेशा रखते हैं, तो आपको चाहिए कि हक़ीक़ी जुस्तजू के साथ इसकी हक़ीक़त दरयाफ़्त करें। आपको इंसाफ के साथ हक़ीक़त ढूंढनी होगी। अक़्ल-ओ-सुबूत, और जो बेहतर तौर पे आगाह अफ़राद पेश करें, उनपे तवज्जुह करनी होगी। कभी कभी ख़ानदानी और समाजी दबाव – और सबसे बढ़कर आपके खुद की ‘अना’- आपको इसकी उल्टी सिम्त धकेलेगी। फौरी तौर पर आप ज़िद्दी हठधर्म बन कर अपनी अना कि पैरवी करना चाहेंगे : “मैं ग़लत नही हूँ !” पर ये हक़ को दफनाने के मुतरादिफ़ होगा। और आप जितना ये करेंगे, हक़ को पाना उतना ही मुश्किल होता चला जायेगा।

अल्लाह हमें दिलों की सख़्ती से बचाये और सिराते-मुस्तक़ीम की हिदायत दे।

Translation of This post
Translated by: Md Adil Hussain

मैं कोशिश करता हुँ की इस पेज पे कोई भी ज़ाती (निजी) बात ना डालूँ, लेकिन मुझे लगता है कि अपने ख़यालात और जो मैं यहाँ लिखता…

Posted by Daniel Haqiqatjou – Hindi on Friday, April 27, 2018

Md Adil Hussain

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