कुछ लोग हमेशा की तरह मेरे पीछे पड़े हुए हैं, जिसको मैं अक्सर नज़रअंदाज़ ही करता हुँ क्योंकि ज़िद्दी लोग अपनी ग़लती नहीं मानते जब वो ग़लत होते हैं। लेकिन हाल ही की शाफ़ई मज़हब की बहस एक तब्सिरा तलब करती है। महसूस होता है कि लोग हैरान हो गए हैं ये जान के की शरीअत ‘मज़हबी आज़ादी’ को तसलीम नहीं करती।

इसपे बहुत कुछ कहा जा सकता है। और में पहले ही इसपे काफी कुछ लिख चुका हुँ। जैसे यहाँ और यहाँ

मैं इस मौज़ू पर गहराई में एक कोर्स भी पढ़ाता हूँ।

मैं सारे तर्क यहां नही दोहराऊंगा (आप इन्हें ऊपर दिए 2 लिंक में पढ़ सकते हैं), लेकिन कोई भी इंसान जो थोड़ा सा भी सीरत-ए-पाक, सलफ़ की तारीख़, और फिक़ही किताबों से वाक़िफ़ हो तो वो ये समझ सकता है कि किस तरह मज़हबी आज़ादी के तसव्वुर की इस्लाम मे कोई बुनियाद नही है।

अब कुछ मुसलमानों को पसंद है कि वो इसकी निशानदेही कर के मामला ऐसे ही छोड़ दें। मैं इस अंदाज को सही नहीं समझता। क्योंकि, हमें पसंद हो या ना हो, आज बहुत सारे मुसलमान इस ग़लतफ़हमी में हैं कि इस्लाम में मज़हबी आज़ादी है। तो इसका इनकार कर के हम शायद और ज़्यादा कन्फ्यूज़न पैदा कर रहे हैं। लेकिन हम इन मसलों को नज़रअंदाज़ भी नही कर सकते – क्योंकि जैसे ही इन मुसलमानों को मालूम चलेगा शाफ़ई मज़हब में दारुल इस्लाम में मुशरीकीन की हैसियत के बारे में, या वो पढ़ेंगे बनु-क़ुरैज़ा के बारे में, या वो सुनेंगे ख़ालिद बिन वलीद र• के बारे में, और इसी तरह की और चीज़ें, तो ये इन्हें शक की खाई में धकेल देगा या इन्हें मजबूर कर देगा की वो इनकार कर दें सहाबा का, उलामा का, या खुद नबी स• का, नउज़ूबिल्लाह। तो क्या करना चाहिए?

जवाब ये है कि हम तनक़ीद करें मज़हबी आज़ादी के तसव्वुर का और ये वाज़े करें कि ये पूरा फ़लसफ़ा ही अपने अंदर तज़ाद रखता है – यानी बेतुका है। जब हम ऐसा करते हैं तो इस बात की कोई ज़रूरत नही बचती कि हम इस्लाम से ये तवक़्क़ो करें कि वो मज़हबी आज़ादी को तस्लीम करे। भला इस्लाम एक बेतुकी चीज़ को क्यों तस्लीम करे? ख़ुदा बकवास बात का हुक्म क्यों देगा? फ़िर हम देख पाएंगे की जदीद सेक्युलर दुनिया जिस अख़लाक़ी ऊंचाई पे खडी हो के बात करती है वो खोखली है – एक छलावा है।

मैं दुबारा कहूंगा कि ऊपर के लिंक खोल के ज़रूर पढें।

अब सारे तर्क/दलीलें अलग रखते हैं। *सारे* मज़ाहिब दारुल इस्लाम में दूसरे दीन/धर्म पे पाबंदियाँ लगाते हैं। शाफ़ई मज़हब पे ख़ास ज़ोर देना ग़लत है। दूसरे मज़ाहिब ख़ुद-में शिर्क को ज़्यादा बर्दाश्त करने वाले ना थे। उन्होंने महज़ अहले-किताब के वसीय मायने ले लिए। इसकी तफ़सील में बहुत कुछ है, लेकिन बुनियादी बात सबकी एक ही है। वो सब पाबंदियाँ लगाते हैं। इनमें किसी का मतलब क़त्ल-ए-आम नही था। इसका मतलब महज़ इतना था कि लोगों को अपने बुतपरस्ताना अक़ीदे छुपा के रखने होंगे। इसी तरीके से हिजरत के 10 साल के अंदर नबी स• के ज़माने में अरब की सरज़मीन को शिर्क/बुतपरस्ती से पाक किया गया। हमें क्या लगता है ये आख़िर कैसे हुआ? ये हज़ारो लोगों का क़त्ल कर के नही हुआ। मुशरीक़ीन अपने अक़ीदे छुपाते। वो मुनाफ़िक़ बन गए।
जैसा कि मैं पहले भी निशानदेहि कर चुका हूँ, मदीना में मुशरीक़ीन का पैदा होना खुद ममज़हबी आज़ादी ना होने का सुबूत है। भला अपने अक़ीदे को क्यों छुपाना अगर हर अक़ीदा एक समान क़ाबिले क़ुबूल हो और हर को बिल्कुल बराबरी का हक़ हासिल हो?

अब हम ये सब बहसें कर सकते हैं, पर उस ज़ाहिरी ऐतराज़ का क्या जो लोगों को हो जाती है? यानी: “मुसलमान ग़ैर-मुस्लिम मुल्कों में अपने दीन पर अमल करने की पूरी आजादी चाहते हैं हालांकि उनकी ख़ुद की शरीयत दूसरे धर्मों को वही इजाजत नही देती!” इसका क्या जवाब दिया जाए? बहुत आसान है। इस्लाम दूसरे धर्मों के बराबर नहीं। इस्लाम हक़ है। दूसरे धर्म नहीं। ज़ाहिर है, कुफ़्फ़ार ये नहीं मानेंगे। पर हम क्यों मानें सेक्युलर मुल्हिद मुअक़्क़ीफ़ को की हर दीनी अक़ीदा बराबर है – मतलब बराबर तौर पे ग़लत हैं? एक मुसलमान होने के नाते, मैं तो ये नहीं मानूँगा। भला हक़ और बातिल को बराबर क्यों माना जाए? मैं तो नही मानने वाला की दूसरे दीन/धर्म भी इस्लाम जितने ही सच्चे, सही, और अच्छे हैं। और मैं ये मानूँ भी क्यों?

फिर से, ये काफ़ी कड़वा मालूम हो सकता है क्योंकि  लिबरल सेक्युलरिज़्म ने हम सबको ज़्यादा या कम गहराई से ज़रूर मुतास्सिर किया है।
“हाँ, हाँ, मुझे पता है, बेवक़ूफ़ डेनियल हर छोटी बड़ी चीज़ के लिए लिबरल सेक्युलरिज़्म को दोष देता है, हा हा हा।”
महज़ इस वजह से की आप इतना मालूम नही कर पाए हैं कि ये असर आसानी से देख पाएं, मुझ पे गुस्सा न करें ये निशानदेही करने की वजह से।

अब ये वाज़े करना बहुत आसान है कि किस तरह सेक्युलर म’अशरे भी कुछ अक़ीदों से भेदभाव करते हैं – हालांकि हो सकता है कि वो इसको ‘धार्मिक भेदभाव’ का नाम ना दें। मिसाल के तौर पे ‘रेसिज़्म/नसलपरस्ती’ (नस्ल की बुनियाद पर इंसान को बेहतर/कमतर समझना) को ले लीजिए। आप अवाम में खुलेआम ये अक़ीदा पेश नहीं कर सकते कि एक नस्ल दूसरे से बरतर है, सिवाय इसके की आपको हर तरफ से मुख़ालिफ़त झेलनी पड़े – कानूनी और समाजी, और ये सही भी है। ये उन कई में से एक अक़ीदा है जिसपे पाबंदी है। लेकिन शिर्क अक़ीदे के लिहाज़ से नसलपरस्ती के मुक़ाबके कहीं ज़्यादा बुरा और नुकसानदेह है। आज लोगों का इसे ऐसा न समझना इसकी सचाई पे कोई असर नही डालता।

बहरहाल, इन बातों की तफ़सील में पूरी किताब लिखी जा सकती है, पर ट्विटर के लिए इतना ही काफ़ी है। अब बिना देरी किए इन बातों को तोड़-मरोड़ने में लग जाइये, बेतुकी तनक़ीद कीजिये, मेरी ग़िबत कीजिये, गालियां दीजिये, मुझे नीचा समझ कर हसी उड़ाइये, वगैरा वगैरा।

Translation of This Twitter Thread
Translated by: Md Adil Hussain

कुछ लोग हमेशा की तरह मेरे पीछे पड़े हुए हैं, जिसको मैं अक्सर नज़रअंदाज़ ही करता हुँ क्योंकि ज़िद्दी लोग अपनी ग़लती नहीं मानते…

Posted by Daniel Haqiqatjou – Hindi on Sunday, June 24, 2018

Md Adil Hussain

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