हमारे लिए हैरतअंगेज हदीस:

रसूलल्लाह ﷺ ने फरमाया : “जो दज्जाल के मुताल्लिक़ सुने के वो ज़ाहिर हो चुका है तो वह उस्से दूर ही रहे क्योंकि : क़सम है अल्लाह की, आदमी उसके पास आएगा तो यही समझेगा के वह मोमिन है, और वह उसका ताबे (पैरोकार) हो जाएगा उन शुबहात (शक्क में डालने वाले ख़यालात) की वजह से जो कि उसके अंदर वह (दज्जाल) पैदा कर देगा। (सहीह, अबु दाऊद 4319)

अगर कोई लफ्ज़ है जो इसे बयान कर सकता है तो वो ये है कि – हमारा दौर शुबहात का दौर है।

हम ताज्जुब कर सकते हैं कि भला कोई अल्लाह पे ईमान रखने वाला दज्जाल की पैरवी कैसे कर सकता है!? इसका जवाब इस हदीस में है। दज्जाल के कई पैरोकार अपने आपको ‘मोमिन’ समझेंगे। लेकिन वो असल मे ‘मोमिन’ नही होंगे। शक, शुबहात, उलझे ख़यालात, और अटकल करना उन्हें धोके में डाल देगा – जो कि उन्हें ‘सीधे रास्ते’ से कोसो दूर कर देगा और आख़िरकार जहन्नुम की आग में ले जा के छोड़ेगा। वो ऐसा सोचेंगे कि दज्जाल की पैरवी ही तक़वा की राह है – हालांकि हक़ीक़त इसके बरअक्स होगी।

और नबी ﷺ ने ये भी कहा कि शुबहात दज्जाल की तरफ से आएंगे। दज्जाल इन अफ़कार (विचारों) को हथियार की तरह इस्तेमाल करेगा। इससे मालूम चला कि हम सब, कुछ अफ़कार और तर्कों से शक्क में पड़ सकते हैं। अफ़कार ग़ैरजानिबदार (तटस्थ) नही होते। अफ़कार महज़ दर्सगाहों (विश्विद्यालयों) की चार दिवारी में शेख़ी बघारने के नही होते। कई अफ़कार ज़हरीले होते हैं और एक नेक-नियत मोमिन को भी गहरे शक्क में डाल सकता है – अगर वो सतर्क ना रहे।

तो एक इंसान ख़ुद को इन उलझनों से कैसे बचाए? जागरूकता (आगाह रहना) इस तरफ पहला कदम है और दज्जाल से दूर भागना भी। फिर सूरह कहफ़ के बारे में रसूलल्लाह ﷺ फरमाते हैं कि ये उसकी हिफाज़त करेगा जो इसे पढ़े और याद करे। और कई चीज़ें उलामा भी बयान करते हैं।

जहां तक शुबहात की बात रही तो इससे बचने के लिए हमे काम करना पड़ेगा और ये सबसे पहले जमा’ह से चिपट कर रहने से होगा। जमा’ह का मतलब आज की ‘अक्सरियत’ नहीं। इसका मतलब है उलामा की अक्सरियत पूरी तारीख़ में। मैं आज कल अक्सर मुस्लिम मुक़र्रिर और दानिशवरों को ऐसी चीज़ें कहते हुए देख रहा हुँ जैसे: “ये 4 इमामों का मुअक़्क़ीफ है और पुराने उलामा का इज्मा भी, पर उन सब से ग़लती हुई थी – और हमारे दौर की सही राय ‘फलाना’ है।”

जब आप ऐसा देखें, तो उल्टे पाँव भागें। क्योंकि अकेली बकरी को लोमड़ी खा जाया करता है। ये शुबहात की सबसे बड़ी निशानी है। अगर आप अपने ज़ेहन को दज्जाल की दावत से महफूज़ रखना चाहते हैं तो इज्मा से चिपट जाइये – भले ही इससे चिपटे रहना आपको हाथ मे अंगारे लेने जैसा महसूस हो।

भले ही आपको वो मुअक़्क़ीफ समझ न आए या आप उसको अपनाने से “अजीब” सा महसूस करें… *खास तौर से* जब आपको वो राय अजीब लगे, *यही* इशारा है कि आपको अब इससे चिपट जाना है। दूसरी ‘राय’ ढूंढने में ना लग जाएं। ऐसी चीज़ें न ढूंढें जो “मॉडर्न” सोच से ज़्यादा क़रीब हो। शुबहात के दौर में ये साफ तौर पे खसारे की राह है। अल्लाह हमे इससे बचाए।

ध्यान दें: इस मशवरे का मतलब ये नही है कि हम “अपने दिमाग पे ताला लगा लें” और हक़ीक़ी तहक़ीकी मिज़ाज को तर्क कर दें। पर हमारे लिए एक हिफाज़त का ज़रिया तो होना ही चाहिए। अगर जो चीज़ हमे अक़्ल के ज़्यादा क़रीब लग रही है – हमें ऐसे मुअक़्क़ीफ इख़्तियार करवा रही है जो कि ज़्यादातर उलामा से अलग है, तो जान लीजिए ये अक़्ल के क़रीब *नही* है। क्यों? क्योंकि हम 1400 साल की इस्लामी तहज़ीब के उलामा से ज़्यादा अक़्ल वाले *नही* हैं। जहां तक समझ-बूझ, इल्म-ओ-बसीरत और आज की इस्तल में – “दिमाग़ की क़ुव्वत” की बात है, तो हम उनकी धूल के बराबर भी नहीं। इसके बरअक्स कुछ भी सोचना महज़ ख़ाम-ख़याली है। तो कितना बेहतर हो अगर हमारे पास सोचने का कोई ऐसा ढंग / तरीका हो जो कि हमें शरीअत को ज़्यादा मज़बूती से थामने में मदद करे – शरीयत उसी शक्ल में जैसा कि हमारे उलामा ने तशरीह फरमाई है। हमें इसकी बहुत ज़रूरत है। पर ऐसी सोंच और फ़र्ज़ी अक़्ली दलाइल जो कि उलामा और उनके मुअक़्क़ीफ से हमें दूर करे – ख़तरनाक है।

Translation of This post
Translated by: Md Adil Hussain

हमारे लिए हैरतअंगेज हदीस:रसूलल्लाह ﷺ ने फरमाया : "जो दज्जाल के मुताल्लिक़ सुने के वो ज़ाहिर हो चुका है तो वह उस्से दूर…

Posted by Daniel Haqiqatjou – Hindi on Sunday, February 25, 2018

Md Adil Hussain

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